
बॉलीवुड में कई बार ऐसा हुआ है जब एक ही किरदार को अलग-अलग समय पर दो अभिनेत्रियों ने निभाया हो। लेकिन हर बार नतीजा एक जैसा नहीं रहा। ऐसा ही कुछ हुआ था जब सदी की दो बेहतरीन अदाकाराएं — रेखा और ऐश्वर्या राय बच्चन — ने एक ही किरदार को पर्दे पर जिया। फर्क बस इतना था कि एक को इस रोल ने स्टारडम की ऊंचाई पर पहुंचाया, जबकि दूसरी के हिस्से आई तारीफें तो मिलीं, पर सफलता और पुरस्कार से दामन खाली रहा।
यह बात हो रही है मशहूर उपन्यास “देवदास” की पारो (पार्वती) की कहानी की। रेखा ने 1980 में आई फिल्म “देवदास” में पारो की भूमिका निभाई थी, जबकि ऐश्वर्या राय बच्चन ने साल 2002 में संजय लीला भंसाली की “देवदास” में यही किरदार दोबारा निभाया। दोनों ही फिल्मों में किरदार का दर्द, प्रेम और सामाजिक मर्यादाओं का संघर्ष केंद्र में था, लेकिन परिणाम अलग-अलग रहे।
रेखा की देवदास को दर्शकों और समीक्षकों की सराहना तो मिली, लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा सकी। उस दौर में रेखा की परफॉर्मेंस को ‘संवेदनशील’ कहा गया, पर यह रोल उनके करियर का मील का पत्थर नहीं बन सका। वहीं, जब संजय लीला भंसाली ने देवदास (2002) बनाई, तो फिल्म भव्यता और भावनाओं का ऐसा संगम बन गई जिसने इतिहास रच दिया।

ऐश्वर्या राय ने पारो के किरदार में अपनी मासूमियत और भावनाओं की गहराई से जान डाल दी। उनकी खूबसूरती, संवाद अदायगी और शालीनता ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। देवदास (2002) ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर बम्पर कमाई की बल्कि देश-विदेश में कई पुरस्कार भी जीते। इस फिल्म ने ऐश्वर्या को एक सशक्त अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर दिया।
जहां रेखा के समय में देवदास सीमित दर्शकों तक पहुंची थी, वहीं ऐश्वर्या की देवदास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बनी। यह फिल्म कान्स फिल्म फेस्टिवल तक पहुंची, और पारो का किरदार भारतीय सिनेमा की यादगार भूमिकाओं में शामिल हो गया।
इस तुलना से साफ है कि एक ही किरदार को दो अदाकाराओं ने अपनी-अपनी शैली में जिया — रेखा ने उसे भावनात्मक गहराई से और ऐश्वर्या ने उसे भव्यता व आधुनिक सेंस के साथ। लेकिन वक्त और प्रस्तुति ने ऐश्वर्या को वह ऊंचाई दी, जो रेखा को नहीं मिल सकी।
फिल्मी दुनिया में यही तो दिलचस्प बात है — किरदार एक ही हो सकता है, पर उसे अमर बनाने की ताकत समय और प्रस्तुति दोनों से तय होती है। रेखा और ऐश्वर्या की पारो इसका बेहतरीन उदाहरण हैं।
